Why did Draupadi married to the Pandavas? द्रौपदी ने पाँच पाण्डवों से शादी क्यों किया?
द्रौपदी ने पाँच पाण्डवों से शादी क्यों किया?
Why did Draupadi marry to the Pandavas?द्रौपदी विवाह की कथा संक्षेप में:- द्रौपदी के विवाह का रहस्य और उसका प्रमाण !
महाभारत का वह अध्याय जिसमें यह पूरा प्रसङ्ग है:- द्रौपदी विवाह प्रसङ्ग महाभारत के वैवाहिकपर्व सेमहाभारत की कहानी से हम सभी यह तो अवश्य ही जानते हैं कि महारानी द्रौपदी के पाँच पति थे और उसके पाँचों पति सगे भाई थे।
किन्तु आपने कभी यह विचार किया कि पाँचों भाईयों की एक ही पत्नी होने का रहस्य क्या है?
मुझे पुरा विश्वास है कि ९० % लोगों को यह रहस्य नहीं पता होगा।
आईए जानते हैं कि आप कौन सी श्रेणी में हैं? ९०% या १०%?
इसके मूल में द्रौपदी के पुर्व के दो जन्मों की कथा है।
जिसका भेद अत्यन्त गुप्त होने
के कारण महर्षि वेद व्यास जी ने द्रौपदी के पिता महाराज द्रुपद को एकान्त
में बताई थी।
आईए सबसे पहले संक्षेप में हम द्रौपदी के जन्म के विषय में जानते हैं, पाञ्चाल नरेश द्रुपद और भारद्वाज पुत्र आचार्य द्रोण दोनों गुरुभाई थे जिनके बीच किसी कारण से शत्रुता भी थी ।
गुरु द्रोणाचार्य से अपने अपमान का बदला लेने के लिए राजा द्रुपद, द्रोण का वध करने वाले पुत्र की कामना से यज्ञ करते हैं जिसके फलस्वरुप “धृष्टद्युम्न” प्रकट होते हैं उसी यज्ञकुण्ड से एक दिव्य कन्या भी प्रकट होती है, जिसका नाम “याज्ञसेनी” रखा गया, द्रुपद की पुत्री होने के कारण लोग उन्हें “द्रौपदी” भी कहते हैं, उनका एक और नाम “कृष्णा” भी है।
द्रौपदी स्वयंवर की शर्त पुर्ण करने के पश्चात द्रौपदी को लेकर अर्जुन जब अपने निवास पर पहुँचे तो उनके एक हास्य विनोद के (मज़ाक) कारण ने पाण्डवों के लिए एक बड़ा धर्म सङ्कट खड़ा हो गया, जो कि द्रौपदी के पाँचों भाईयों से विवाह का कारण बना किन्तु यह एकमात्र कारण नहीं था।
द्रौपदी के विवाह
से जुड़ा एक गूढ़ रहस्य (की कथा) महर्षि वेद व्यास जी ने राजा द्रुपद को एकान्त में ले जाकर कहा, जिसके कारण द्रुपद ने विवाह के लिए तुरन्त ही स्वीकृति दे
दी।
अपने पुर्व जन्म में सभी पाण्डु पुत्र इन्द्र (पाँच इन्द्र) थे और द्रौपदी स्वर्गलोक की लक्ष्मी थीं। पाँचों इन्द्रों को भगवान शिव के क्रोध व लीला के कारण मनुष्यलोक में जन्म लेने का आदेश मिला, जिसके लिए चार इन्द्रों ने धर्म, वायु, व अश्विनीकुमार द्वारा माता के गर्भ में स्थापित होने की इच्छा की और पाँचवें इन्द्र ने स्वयं के अंश द्वारा ही जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की। भगवान महादेव ने उन सभी की बात मान ली और स्वर्ग की लक्ष्मी को उन सभी की पत्नी बनने का आदेश दिया ।
उन पाँचों इन्द्र के नाम इस
प्रकार है; १ विश्वभूक्, २ भूतधामा, ३ शिबि,
४ शान्ति और ५ तेजस्वी। तेजस्वी ही वह इन्द्र हैं, जिसने स्वयं को अर्जुन के रुप में उत्पन्न किया था।
वेदव्यास जी ने आगे कहा कि, ये पाण्डव जो पहले इन्द्र रह चुके हैं, द्रौपदी
का इनकी पत्नी होना पहले ही निश्चित हो चुका है।
यज्ञ की अग्नि से पुत्र के बाद पुत्री का उत्पन्न होना सिद्ध करता है कि यह सब देव इच्छा से ही हो रहा है।
त्रिकालदर्शी
वेदव्यास जी ने राजा द्रुपद को एक और वृतान्त सुनाया, जिसके अनुसार एक ऋषि कन्या ने कठोर तप करके भगवान शंकर को
प्रसन्न किया और अनायास ही पाँच बार कहा कि, "मैं सर्वगुण सम्पन्न पति चाहती हूँ"। जिसके उत्तर में भगवान ने उस साध्वी
को वर देते हुए कहा कि,
"तुम्हारे पाँच पति होंगे, क्योंकि तुमने पाँच बार “पति चाहिए” ऐसा कहा था", किन्तु इसके लिए तुम्हें दूसरे
देह में प्रवेश करना होगा"। घोर तप करके ऋषि
कन्या ने ही स्वर्गलोक की लक्ष्मी व तदनन्तर तुम्हारी पुत्री के रुप में जन्म लिया
है। स्वयं ब्रह्मा जी ने ही इसे (द्रौपदी को) पाण्डवों की पत्नी होने के लिए रचा
है अतः तुम्हे जो उचित लगे वो करो।
राजा द्रुपद का संदेह दूर हो
चुका था और उन्होंने अब इस विवाह की स्वीकृति दे दी।
लोकोक्ति : ऐसा कहा जाता है कि द्रौपदी ने यह नियम बनाया था कि सन्तान प्राप्त होने तक कोई एक ही पाण्डव द्रौपदी के महल में रह सकता है और तब तक अन्य पाण्डव का वहाँ जाना वर्जित रहेगा।
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